आज आंखों में जो ख़ुमारी है
उनके ख्वाबों में शब गुज़ारी है
कौन लाया है होश में मुझको
किस नज़र ने नज़र उतारी है
हिज्र देखा है वस्ल देखा है
दोनों जानिब ही बे करारी है
फिर किताबों के फूल महके हैं
फिर तेरी याद दिल पे तारी है
दिल के टुकड़े हुवे हैं सीने में
जाने जांँ चोट ये करारी है
याद करते हो रात दिन मुझको
बस यही आप की बीमारी है
जिसको जाने ग़ज़ल बताते हो
वो ग़ज़ल तो मीयां हमारी है
हमने काटी है उम्र उनके बग़ैर
कौन कहता है के गुज़ारी है
हम वफ़ा दारे मुल्क हैं ग़ाफ़िल
बस यही दास्तां हमारी है
Anwar gafil