Anwar gafil

आज आंखों में जो ख़ुमारी है
उनके ख्वाबों में शब गुज़ारी है

कौन लाया है होश में मुझको
किस नज़र ने नज़र उतारी है

हिज्र देखा है वस्ल देखा है
दोनों जानिब ही बे करारी है

फिर किताबों के फूल महके हैं
फिर तेरी याद दिल पे तारी है

दिल के टुकड़े हुवे हैं सीने में
जाने जांँ चोट ये करारी है

याद करते हो रात दिन मुझको
बस यही आप की बीमारी है

जिसको जाने ग़ज़ल बताते हो
वो ग़ज़ल तो मीयां हमारी है

हमने काटी है उम्र उनके बग़ैर
कौन कहता है के गुज़ारी है

हम वफ़ा दारे मुल्क हैं ग़ाफ़िल
बस यही दास्तां हमारी है
Anwar gafil