इक ख़्वाब है उसी को हक़ीक़त बनाउँगा
मैं दोस्ती को अपनी मुहब्बत बनाउँगा
जो तू नहीं तो और कोई क्यों हो मेरे साथ
तन्हा रहूं ता-उम्र वो आदत बनाउँगा
पहले तो बुत बनाने की तरक़ीब सीख लूँ
फिर उसके बाद तेरी भी मूरत बनाउँगा
तुम दूसरे जहाँ को ही ज़न्नत भले कहो
मैं तो इसी जहाँ को ही ज़न्नत बनाउँगा
Santosh sagar