देवेश त्रिपाठी

आँख को दर्पन समझ कर जी रहे हैं
हम तुम्हें उपवन समझ कर जी रहे हैं
जेठ में तुमने लगाया था गले से
आज तक सावन समझ कर जी रहे हैं
देवेश त्रिपाठी