Satyendra Bharill

यूँ बहुत दिन गए मध्य में मौन है
बेकली शोर बन के डराने लगी
कहने को तो नहीं खास है कुछ मगर,
आपकी याद रह-रह सताने लगी...!!


कुछ अंधेरों ने घेरा है रिश्ता प्रिय
कुछ तुम्हारे जुदा मुझसे हालात हैं
कुछ जो तुमने छिपाई हैं मुझसे सदा
बीच में ऐसी कई भेद की बात हैं

हां ये सच है हुआ हूं मैं इससे दुखी
चोट ये मन को मेरे डिगाने लगी
कहने को तो नहीं खास है कुछ मगर,
आपकी याद रह-रह सताने लगी...!!


मैं नहीं जानता हुई क्या है ख़ता
न ही मैंने किया कोई तुमसे दग़ा
न ही मेरा जिया तुमसे ऊबा कभी
मैं समझता था रिश्ता मुकम्मल हुआ

फिर अचानक तुम्हारी नज़र फिर गई
शूल दिल में मेरे जो चुभाने लगी
कहने को तो नहीं खास है कुछ मगर,
आपकी याद रह-रह सताने लगी...!!


मैंने चाहा नहीं कोई विच्छेद हो
सिर्फ विश्वास की मैंने की कामना
मैं झुका रह गया, तुम मगर थे अड़े
आ गई तुममें इससे अहम भावना

जिसको सालों संवारा उसी प्यार पे
होके बेदर्द बिजली गिराने लगीं
कहने को तो नहीं खास है कुछ मगर,
आपकी याद रह-रह सताने लगी
Satyendra Bharill