कभी तुम ही कहते थे मुझसे
जब से आए हो तुम मन में
खुशियां ही खुशियां जीवन में
जैसे बेला महक गए!
ऐसा कोई दिवस नहीं है,
जब ना तेरी याद सताई
सघन बीथियां सुमम रास्ते,
सब में तुम्हें आवाज लगाई
तुम तो शुभचिंतक थे मेरे
मेरा जीवन बदला तुमने
फिर तुम कैसे बदल गए!
यह भी माना मुंह से हमने
किया ना वादा, कसम उठाई
बातचीत जो हुई नयन से
कहो दोस्त वो क्यों बिसराई
गर्दिशों के सभी सितारे
राहु केतु शनिचर सारे
ज्यों मुझसे ही चिपक गए!
ज़िक्र मेरा ना करते चाहे
ख़त ना लिखना था, ना लिखते
कभी ख्यालों में ना आते
ख्वाबों में भी कभी न दिखते
कुछ तो हक बनता है हमारा
याद तुम्हारी आने पर
कह कर आंसू ढलक गए!
सावन भादों हैं आंखों में
अधर हुए जेठी दोपहरी
सपने सब धूं धूंकर जलते
सांसें भी हो चली हैं गहरी
तेरे बिन क्या होली दिवाली
लगती है हर खुशी सवाली
जीने के अब ललक गए!
कभी तुम ही कहते थे मुझसे
जब से आए हो तुम मन में
खुशियां ही खुशियां जीवन में
जैसे बेला महक गए!
Satyendra Bharill