Mohit Subran (मोहित सुब्रन)

ज़बूँ-हाली में घुट-घुट के हँसी धुँदला गई वर्ना
कभी मैं भी बहारों जैसे खुल के मुस्कुराता था
Mohit Subran (मोहित सुब्रन)