Sandeep Shrivastava

यक़ीन करते रहे हम भी दास्तानों में
नहीं है कोई ख़ुदा सात आसमानों में

वो कह रही थी बिछड़ना ख़ुदा की मर्ज़ी है
बहाना यार ये बरतर था सब बहानों में

हमारे कमरे में तस्वीर है तुम्हारी और
तमाम फूल भी नकली हैं फूल-दानों में

हम ऐसे लोग बहुत कम थे मेरी जान सुनो
हम ऐसे लोग मयस्सर हैं अब फ़सानों में

कभी जो दिल करे रोना है, तो चली आना
अभी भी जान बहुत है हमारे शानों में

तुझे तो घर के सभी लोग याद करते हैं
प तेरा ज़िक्र भी होता है महज़ तानों में

हमारे दिल में बनाओ न घर नई लड़की
कहाँ पनपता है पौधा कोई चटानों में

टिकाए बैठे हैं गिरते हुए शजर से पीठ
हमारा नाम लिखा जाए साएबानों में
Sandeep Shrivastava