Aatish Muradabadi

तेरी तस्वीर बनाने में कमी छोड़ी है
इक मुसव्विर ने जो आँखों में नमी छोड़ी है

हम करें तर्क-ए-तअल्लुक ये तो मुमकिन ही नहीं
होके मजबूर बहुत तेरी गली छोड़ी है

क्या तुम्हें वक़्त बदलने का भरोसा ही नहीं
चश्म-ए-उम्मीद ये क्यों ख़ूँ से भरी छोड़ी है

दो समझता मैं रहा दैर-ओ-हरम को अबतक
ये वो आदत जो मुश्किल से अभी छोड़ी है

कितनी बंजर-सी ज़मीनों को लहू से सींचा
किश्त-ए-जाँ में भी तो अश्क़ों की नमी छोड़ी है

अहल-ए-मसनद से ज़रा जाके ये पूछो आतिश
तुमने गुलशन में ये क्यों आग लगी छोड़ी है
Aatish Muradabadi