Arun Agrawal

हम कैसे हकदार हुए हैं, तेरे सपनों की सिद्धि के
तुमने जो-जो त्याग किया है
यह केवल उसका हासिल है

कड़ी तपस्या, त्याग, समर्पण, हर साधक का कर्म यही है
दीपक बन जलते रहना है, मानवता का धर्म यही है
उसको वह परिणाम मिलेगा
जो जितना जिसके काबिल है
तुमने जो-जो त्याग किया है
यह केवल उसका हासिल है

देवों का देवत्व जगाने, मंदिर-मंदिर जाना होगा
घंटी-घंटी बजना होगा, कीर्तन-कीर्तन गाना होगा
एक पत्थर में प्राण जगाना
अब जाना कितना मुश्किल है
तुमने जो-जो त्याग किया है
यह केवल उसका हासिल है

पैरों के जंजीर नहीं, हम स्वयं, स्वयं के ही शत्रु हैं
अब सब बाहर फेंक निकालो, आंखों में जो भी अश्रु हैं
कदम बढ़ाओ, ऐसे, जैसे
रस्ता देख रहा मंजिल है
तुमने जो-जो त्याग किया है
यह केवल उसका हासिल है

प्रेमिल-प्रेमिल फूल खिलेंगे, आँगन तभी सुगंधित होगा
खुशियाँ कहती शर्त यही है, मन से मन अनुबंधित होगा
सारा उपवन जांच रहा है
मेरा मन कितना स्नेहिल है
तुमने जो-जो त्याग किया है
यह केवल उसका हासिल है

मन के आँगन धूप खिली है, सुबह-सुबह अंगड़ाई लेकर
एक प्यासा पंछी आया है, खेतों में पुरवाई लेकर
जीवन तभी निरर्थक है जब
मन बोझिल है, तन तंद्रिल है
तुमने जो-जो त्याग किया है
यह केवल उसका हासिल है
Arun Agrawal