Arun Agrawal

हाथ धरकर रोक लूँ कैसे तुम्हें, इतना बताओ
जा रही हो देहरी से; तो प्रिये, अब जाओ, जाओ

कब किया तुमने प्रणय का पत्र था स्वीकार, बोलो
कब हृदय के एक छुअन का है दिया अधिकार, बोलो
जा रहे अब छोड़कर तुम आज मेरा द्वार साथी
जा रहे पर छोड़ जाना पास कुछ यादों की थाती
स्वाति की बूँदें नहीं पाएगा अब चातक, बताओ?
जा रही हो देहरी से; तो प्रिये, अब जाओ, जाओ

रंग फीका हो रहा है बाग का जाने से तेरे
जाने अब कैसे बसायेंगे यहाँ पंछी बसेरे
अब हवा भी बोल देगी, मैं किसे मिलने को आऊँ
तितलियाँ भी सोचती हैं, गीत मैं किसको सुनाऊँ
आज फिर कैसी विवशता आ गई, बस ये बताओ
जा रही हो देहरी से; तो प्रिये, अब जाओ, जाओ

जाओ पर इन बादलों को दुःख में तुम हँसना सीखा दो
वेदना का भार लेकर तुम भी तो हँसकर दिखा दो
पर्वतों का नाम लेकर ढीठ बन हम भी हँसेंगे
प्रेम अब जब भी करेंगे, हम कसौटी पर कसेंगे
आ रही जो भी सदा, मन से वो हमको भी सुनाओ
जा रही हो देहरी से; तो प्रिये, अब जाओ, जाओ

कोई कब पीड़ा किसी की; हा! ठहर-कर देखता है
ठंड में भी देह अंगीठी स्वयं की सेकता है
पादत्राणों को कहाँ मिलते हैं कंकड़, शूल, छाले
हम हैं कि बस जी रहे हैं, मन में कितनी टीस पाले
है कहानी क्या तुम्हारे पास कुछ ऐसी, बताओ
जा रही हो देहरी से; तो प्रिये, अब जाओ, जाओ

जानता हूँ कि ये मन तेरा भी अश्रु से भरा है
तुम भी तो ये जानते हो मन हमारा भी खरा है
पर नदी एक उम्र भर अब प्यास से प्यासी हुई है
दृश्य है मणिकर्णिका-सी, भावना काशी हुई है
सार्थक रत्नावली, तुलसी बिना कोई दिखाओ
जा रही हो देहरी से; तो प्रिये, अब जाओ, जाओ

जा रही मधुमास लेकर, छोड़कर मलमास मुझको
क्या तुम्हारे बिन है जीने का कोई अभ्यास मुझको
अब नहीं मुझको कोई कौतुक, नहीं उल्लास कोई
तुम बताओ क्या तुम्हें है ज़िंदगी से आस कोई
साथ जो मेरा नहीं होगा करोगे क्या, बताओ
जा रही हो देहरी से; तो प्रिये, अब जाओ, जाओ

हम तुम्हारे ही नयन से देखकर हर सुख हैं पाते
शब्द जब तेरे अधर पर झूमते, हम गीत गाते
माथ तेरा चूमकर ही भाग मेरा जागता है
राधिका से कोई मोहन और क्या कुछ माँगता है
जा रही हो, जाओ; लेकिन नेह एक अंतिम जताओ
जा रही हो देहरी से; तो प्रिये, अब जाओ, जाओ
Arun Agrawal

Arun Agrawal | We The Sukhanwar