हे प्रिय! गर दूर जाना है तो तुम निश्चिन्त जाओ
पर कभी भी पालकी से तुम पलटकर देखना मत
नस नहीं काटेंगे हम, कायर नहीं, बुज़दिल नहीं हैं
हम तुम्हारी याद की चादर में आँसू पोंछ लेंगे
जिस तरह बेवा बेचारी काटती है दिन अकेले
हम तुम्हारे बिन अकेले ज़िंदगी भी काट लेंगे
है तुम्हारे साथ दुनिया, तुम ख़ुशी के गीत गाओ
हम विरह की वेदना कैसे सहेंगे, सोचना मत!
हे प्रिय! गर दूर जाना है तो तुम निश्चिन्त जाओ
पर कभी भी पालकी से तुम पलटकर देखना मत
राम के वनवास जैसा चल रहा जीवन हमारा
बिन तुम्हारे इस जगत के वन में विचरण कर रहे हैं
तुम गई हो रूठकर जब से हमारी ज़िंदगी से
याद कर अपनी सिया को, हाय! घुटकर मर रहे हैं
राम जैसे रो पड़े थे जानकी से दूर हो कर
रो पड़ेंगे हम भी, तुम रिश्तों की डोरी तोड़ना मत
हे प्रिय! गर दूर जाना है तो तुम निश्चिन्त जाओ
पर कभी भी पालकी से तुम पलटकर देखना मत
दिन का सूरज काटता है, रात चंदा पूछता है
रो रहे हो या किसी को दे रहे हो तुम विदाई
आँख के बादल भी मेरे लब पे गिर के पूछते हैं
जो कभी मेरी रही थी, क्यों हुई अब वो पराई
दूर होने का किसी से कोई कारण क्यों बतायें
हम किसी से क्यों कहेंगे, तुम किसी से बोलना मत
हे प्रिय! गर दूर जाना है तो तुम निश्चिन्त जाओ
पर कभी भी पालकी से तुम पलटकर देखना मत
याद की अब खिड़कियों से हम तुम्हें देखा करेंगे
बाल सहलाकर तुम्हारे भाल को हम चूम लेंगे
याद कर लेना हमें तुम जब ख़ुशी की हो ज़रूरत
आँसू तो हम बन न पाये, है वचन मरहम बनेंगे
आँख से आँसू निकलकर होंठ को छू ले कभी तो
भींगने देना अधर को, ओढ़नी से पोंछना मत
Santosh sagar