मशीनी दौर की ज़िद है नया कुछ कर दिखाने की
क़वायद है शुरू इन्सान को पत्थर बनाने की
पुराने से पुराने भी कुरेदे जख़्म जाते हैं
मुझे अच्छी नहीं लगती यही फ़ितरत ज़माने की
दिखावा अपनी शोहरत का ज़ियादा वो ही करते हैं
नहीं औक़ात रखते हैं मियां जो चार आने की
रहा बारिश कभी तूफ़ां कभी सय्याद का ख़तरा
परिन्दों ने रखी बुनियाद जब भी आशियाने की
ग़मों से ही रही "संगीत" जिसकी रिश्तेदारी हो
जुटाये वो भला ताक़त कहाँ से मुस्कुराने की
Sangeet pandey