मरने के आसार दिखाई देते हैं
चारों जानिब यार दिखाई देते हैं
जिनकी ख़ातिर पहले हम इक सीढ़ी थे
उनको अब दीवार दिखाई देते हैं
कुछ है, चुन लेते है गुल बागीचों से
कुछ को तो बस ख़ार दिखाई देते हैं
मेले लगते थे पहले त्यौहारों पर
अब तो बस बाज़ार दिखाई देते है
छिप जाते है भीड़ में हम जैसे चेहरे
ढूंढों तो दो-चार दिखाई देते हैं
डॉ• सचिन चौधरी 'शाश्वत'