हाल-ए-दिल अपना यूँ भी छुपाना पड़ा
दर्द-ए-ग़म में मुझे मुस्कुराना पड़ा
ज़िंदगी को गले यूँ लगाना पड़ा
उम्र भर बोझ ख़ुद का उठाना पड़ा
जिसके दर को बनाया था अपना जहाँ
हाए उस दर से भी दूर जाना पड़ा
खूँ के रिश्ते फ़क़त नाम के ही रहे
इसलिए ग़ैर को आज़माना पड़ा
जिस्म से रूह मेरी न रुख़्सत हुई
मौत के वक़्त उसको हटाना पड़ा
सिर्फ़ माँ की मुहब्बत ही बे.लौस थी
इसलिए बस उसे भूल जाना पड़ा
इस जहाँ में मुहब्बत है सबसे हसीं
इश्क़ करने को आतिश ज़माना पड़ा
Aatish Muradabadi