जागरण की देहरी पर

जागरण की देहरी पर पाँव रख तू
मैं तुझे फिर से जगाने आ गया हूँ!

तू अकेला ही नहीं सब हैं अकेले
चाँद सूरज कब निकलते भीड़ ले-ले
ये हवा, धरती, गगन, जल, अग्नि भी तो
सब अकेले ही यहाँ हर खेल खेले

दीप भी जलकर अकेला कह रहा है
मैं यहाँ तम को भगाने आ गया हूँ!

मानता हूँ है बहुत विपरीत मौसम
तेज़ आँधी है घटा भी बो रही तम
पतझड़ों को आज सत्ता-सुख मिला है
मन रहा मधुमास के घर रोज़ मातम

मौसमों की यह व्यवस्था देखकर ही
मैं नया मौसम उगाने आ गया हूँ!

जो हुआ सो हो गया, क्या याद करना
व्यर्थ बीती बात पर अवसाद करना
गीत लिख मौलिक न भूले से कभी तू
सूक्तियों का पद्य में अनुवाद करना

तू अकेला ही नहीं इस मंच पर मैं
गीत तेरे साथ गाने आ गया हूँ!
Dr. Urmilesh Shankhdhar