लौ अभी जारी रहे!

इन अँधेरों की फ़सल
जड़ से न कट पाई अभी
दीपकों ! तुम बुझ न जाना
लौ अभी जारी रहे !

किस क़दर बेहाल है यह
रोशनी की ज़िन्दगी
सिर्फ़ खिड़की पर उजाला
और घर में गन्दगी
मुट्ठियों में क़ैद हैं
अब भी प्रलोभन रात के
दीपकों ! तुम झुक न जाना
लौ अभी जारी रहे!

आदमी की आस्था पर
लग गये पैबन्द हैं
क़ैद हैं पंछी मगर
पिंजरे सभी स्वच्छन्द हैं
मौन हे कलरव मधुर
कोलाहलों के सामने
दीपकों! तुम चुक न जाना
लौ अभी जारी रहे!
Dr. Urmilesh Shankhdhar

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