इन स्कूलों में भरे पड़े
बच्चे पिंजरे के तोते हैं।
जो कहो वही रटते हैं ये
रटने से कब नटते हैं ये
हर मौसम में छै-छै घन्टे
भूखे-प्यासे खटते हैं ये
हँसते हैं कभी न रोते हैं।
हर रोज़ ड्रेस में कसे-सजे
ये उत्सव में ढोल से बजे
है इन्हें छोड़कर कौन यहाँ
जो ‘जन-गण-मन’ का भजन भजे
ये प्रजातंत्र में पोते हैं।
ये स्वागत गान सुनाते हैं
हर रैली में खप जाते हैं
झंडे-बैनर ये उठा-उठा
जयकारे ख़ूब लगाते हैं
अनचाहा बोझा ढोते हैं।
Dr. Urmilesh Shankhdhar