वे दिन बीत गए जीवन के
जब छलांग भर-भर के
दौड़ा करते थे मृगछौने मन के!
अब न कभी मुंडेर पर बैठा
कागा अपने सगुन सुनाता
और न अब भीगी पलकों का
सावन मन में अगन लगता
अब तो पहली के वेतन तक
सीमित हुए भाव यौवन के!
मन के मौन महल में रोती
आज एक टूटी शहनाई
लिखने लगा व्यंग्य यह जीवन
भूल गया अब गीत-रूबाई
उजड़ गया सपनों का मधुबन
ज्योति-पंख कट गए किरन के!
झुलस गई यांत्रिकाओं में
महुआ सी मदरिल मुस्कानें
यायावर बन भटक रही हैं
चुम्बक-सी सादी पहचानें
सिर्फ काग़ज़ी व्यवहारों से
जुड़े रह गये सूत्र मिलन के!
प्रेम नगर में आज खिंच गई
चाँदी की लक्ष्मण रेखाएँ
निष्कासित हो रहे विशेषण
पुजतीं अधकचरी संज्ञाएँ
अर्थहीन शब्दों को ढोते
आज ग्रन्थ हल्दिया वचन के!
अब तो दफ्तर की फ़ाइल में
बन्द हो गई हैं कविताएँ
ख़ुशियों की डायरी लिख रहीं
रोज़-रोज़ की नई व्यथाएँ
हवा हो गये ख़्वाब हमारे
उस आवारा क्वाँरेपन के!
Dr. Urmilesh Shankhdhar