सृजन बिकने नहीं देंगे

भले ही तुम प्रलोभन दो हमें अपनी कृपाओं के
मगर हम लेखनी का बाँकपन बिकने नहीं देंगे।
भले बाग़ी बताओ या हमें फाँसी चढ़ाओ तुम
मगर हम मौत के डर से सृजन बिकने नहीं देंगे।

वही हमने लिखा है आज तक जो कुछ सहा हमने
भला डरकर किसी भी रात को कब दिन कहा हमने
इसी से हम उपेक्षित रह गए उनकी सभाओं में
न उनके साथ महफ़िल में लगाया क़हक़हा हमने

निमंत्रण मिल रहे हैं आज भी सुविधा भरे हमको
मगर तन के लिए ख़ुद्दार मन बिकने नहीं देंगे।

हमें इन ‘दल-दलों’ का पार्टियों का ध्वज नहीं बनना
सियासी महफ़िलों की रेशमी सजधज नहीं बनना
तिमिर का नाश करने को जलेंगे दीप बनकर हम
हमें आकाश वाला चाँद या सूरज नहीं बनना

हमें मत चुटकला समझो समर्पित गीत-कवि हैं हम
हँसी के हाथ हम अपना रुदन बिकने नहीं देंगे।

कहे दुनिया हमें कुछ भी मगर कायर नहीं हैं हम।
रहे दर साफ़ अन्दर गन्दगी वह घर नहीं हैं हम।।
Dr. Urmilesh Shankhdhar

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