लेखनी का इस तरह से मत करो अपमान
लिखना बन्द कर दो!
बेचने को मित्रवर! होते नहीं अरमान
लिखना बंद कर दो!
मत करो गुणगान शब्दों के घिनौने आचरण का
मत दबाओ स्वर किसी भी अर्थ के अन्तःकरण का
सत्य से परिचित न हो पाए अगर श्रीमान!
लिखना बंद कर दो!
मान पत्रों, स्वागतों अभिनन्दनों के तुम सृजेता
कवि नहीं, तुम जादुई अभिव्यक्ति के केवल प्रणेता
दर्द की गहराइयों का कब तुम्हें है ध्यान
लिखना बंद कर दो!
चन्द पैसों के लिए गिरवी रखा ईमान तुमने
पूजकर पाषाण गन्दा कर दिया भगवान तुमने
जानकर भी तुम बने क्यों इस तरह अनजान
लिखना बंद कर दो!
है सृजन वह साधना जो रोकने से रुक न पाये
चन्द ऊँची कुर्सियों के सामने जो झुक न पाये
पर नहीं तुम कर सके इस शोध का संधान
लिखना बंद कर दो!
वो लिखें तो वक़्त के आघात से डरते नहीं हैं
जो कभी अच्छे-बुरे हालात से डरते नहीं हैं
यदि न ऐसा कर सको तो बात यह लो मान
लिखना बंद कर दो!
Dr. Urmilesh Shankhdhar