किस तरह तुमको सुनाएँ गीत हम
गीत भी अब तालियों तक आ गये!
हर सभा अब भीड़ का पर्याय है
और बहरे हैं सभी श्रोता यहाँ
मंच पर अनुवादकों की धूम है
मूल तो नेपथ्य में रोता यहाँ
अब सभापति के सभी आशीष भी
पारिवारिक गालियों तक आ गये!
ज़िन्दगी की इस अपाहिज दौड़ में
हम बड़े इतने कि आदिम हो गए
झूठ जब बोले मिली तब मुंसिफ़ी
सत्य जब बोले तो मुजरिम हो गये
न्यायधीशों के निहत्थे फैसले
चाय की कुछ प्यालियों तक आ गये!
हो गई जबसे कला सस्ती यहाँ
खूब मँहगे भाव बिकती कूंचियाँ
घट गये अनुभूतियों के आयतन
शब्द-सी थुलथुल हुई अभिव्यक्तियाँ
पेट की ख़ातिर ह्रदय के भाव भी
किस क़दर कंगालियों तक आ गये!
Dr. Urmilesh Shankhdhar