सच्चाई लिख

हाथ में तेरे क़लम है
यह क़लम तेरा धरम है
हो सके तो लिख-सच्चाई, लिख
सजग वातावरण के नाम पर!

कुछ अशोकी लाट वाले
कुरकुरे काग़ज सँभाले
जा रहे हैं जो सृजन को बेचकर, ग़द्दार हैं वे
भूख के होकर हवाले
पर नहीं हथियार डाले
जा रहे हैं जो प्रलोभन फेंककर, फ़नकार है वे
तू इन्हें अपना बना ले
दर्द को गहना बना ले
हो सके तो दिख उषा-सा, दिख
सुबह के आचरण के नाम पर!

कल्पना से जो भरी है
वह कला जादूगरी है
जो इसे खिलवाड़ समझे हैं बहुत नादान हैं वे
भोगने पर जो मिली है
पीर वह गंगाजली है
जो इसे रसधार समझे हैं बड़े इन्सान हैं वे
हो सके तो सिख
उन्हीं से सिख
कला को जागरण के नाम पर!
Dr. Urmilesh Shankhdhar

सच्चाई लिख | We The Sukhanwar