लिखते जा रहे हैं!

हर तरफ़ से मिल रहे आघात लिखते जा रहे हैं!
धूप-सर्दी या घिरे बरसात लिखते जा रहे हैं!

लिख रहे हैं इसलिए लिखना ज़रूरी है
बिन लिखे अस्तित्व की संज्ञा अधूरी है
इसलिए क्या दिन, हमें क्या रात लिखते जा रहे हैं!

लोग कहते हैं कि लिखने से मिलेगा क्या
ज़िन्दगी का फूल बंजर में खिलेगा क्या
पर न जाने कौन-सी है बात, लिखते जा रहे हैं!

हम न लिखते तो अपाहिज़ दर्द हो जाते
जागरण की देहरी पर अर्थ सो जाते
हाथ में पकड़े क़लम अर्थात् लिखते जा रहे हैं!

हम चले सीधे सड़क पर तब पहुँच पाए
शार्टकट से मंज़िलों तक हम नहीं आए
दूर हमसे दूर यातायात लिखते जा रहे हैं!

लेखनी से हर चरण को आचरण देकर
हम रहेंगे गीत को वातावरण देकर
फिर भले ही शह मिले या मात लिखते जा रहे हैं!
Dr. Urmilesh Shankhdhar

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