Dr. Urmilesh Shankhdhar

कितनी सड़कें कितनी गलियाँ, लाँघती है सरवती
तब मेरे घर आके बर्तन माँजती है सरवती

मेम साहब उसको जिस दिन भूल जायें डाँटना
मन ही मन उस रोज़ खुद को डाँटती है सरवती

जब नई साड़ी पहन आती है लगता है मुझे
पतली कीलों पर कलैण्डर टाँगती है सरवती

पीके दारू रोज़ उसको मारता है उसका मर्द
ये बताते वक़्त अक्सर खाँसती है सरवती

उसके हाथों की लकीरें कबकी काली पड़ चुकीं
फिर भी उनमें चाँदनी ही आँकती है सरवती
Dr. Urmilesh Shankhdhar