Dr. Urmilesh Shankhdhar

धूप, सर्दी या घिरे वरसात रिक्शा खींच तू
तू है बी. ए. पास तो क्या बात रिक्शा खींच तू

सारे दफ़्तर अर्ज़ियों के बन गए गोदाम हैं
आजकल अच्छे नहीं हालात रिक्शा खींच तू

अब तो बस तुझको सिफ़ारिश से मिलेगी नौकरी
डिग्रियों की कुछ नहीं औकात रिक्शा खींच तू

भूख से बढ़कर न कोई सच है इस संसार में
बस इसी सच के लिए दिन-रात रिक्शा खींच तू

ज़िन्दगी भी तीन पहियों का है रिक्शा जान ले
सुख और दुख पैडल हैं, फिर क्या बात रिक्शा खींच तू

तू जवां है, जिसको चाहे कुर्सियों से खींच ले
भूलकर फिलहाल ये जज़्बात रिक्शा खींच तू
Dr. Urmilesh Shankhdhar