न अब याद गुज़रे वो लम्हात करिए
सदी है नई अब नई बात करिए
कहाँ जा रहे थे कहाँ आ गये हैं
कभी ख़ुद से भी ये सवालात करिए
सभी को पता है हक़ीक़त तुम्हारी
न अब और ज़्यादा तिलस्मात करिए
सभी ऊँचे-नीचे मकां जिसमें भीगें
कभी आप ऐसी भी बरसात करिए
सियासत में जाना अगर हो ज़रूरी,
नई रोज़ कोई खुराफ़ात करिए
सभी से मुलाक़ात होती रहेगी
कभी ख़ुद से भी तो मुलाक़ात करिए
अभी से न थक-हारकर बैठिएगा
जहाँ शाम थे बस वहीं रात करिए
Dr. Urmilesh Shankhdhar