Dr. Urmilesh Shankhdhar

सन्दर्भ ख़ुशबुओं का वीरान हो रहा है
क्या-क्या कहें चमन में क्या-क्या न हो रहा है

सूरज कभी उगेगा होगी सुबह कभी तो
विश्वास हो न पाया अनुमान हो रहा है

पिंजरे के सारे क़ैदी सैयाद बन चुके हैं
अब नीड़ पंछियों का सुनसान हो रहा है

वो जो शोध कर चुके हैं पहले किसी विषय पर
फिर से उसी विषय पर संधान हो रहा है

दीपक तले अँधेरा लेकर जुड़ी सभा है
जुगनू का मंच से अब गुणगान हो रहा है

चलते हुए चरण हैं पर आचरण नहीं है
क्या जाने किस दिशा में अभियान हो रहा है

ऐ ‘उर्मिलेश’ अब है कागों का बोलबाला
हंसों का महफ़िलों से प्रस्थान हो रहा है
Dr. Urmilesh Shankhdhar

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