Dr. Urmilesh Shankhdhar

ग़रीबों के ये बच्चे हैं बड़े ज़ाहिल बनेंगे ये
अगर कुछ पढ़ गये तो आपकी मुश्किल बनेंगे ये

इन्हें मज़हब में, क़ौमों में हमेशा बाँटकर रखना
इकट्ठे हो गये तो आपके क़ातिल बनेंगे ये

इन्हें जम्हूरियत के वास्ते भूखा रखो साहिब
भरोगे पेट जो इनका तो पत्थर दिल बनेंगे ये

ग़रीबों के ये नारे तो ग़रीबों से ही ज़िन्दा हैं
ग़रीबी मिट गई तो आपके क़ाबिल बनेंगे ये

तुम्हें ऊपर चढ़ाया है इन्होंने सीढ़ियाँ बनकर
न जाने कब तुम्हारी राह की मंज़िल बनेंगे ये

घुने लकड़ी के तख़्तों -सा इन्हें दरिया में मत फ़ेंको
कभी कश्ती बनेंगे तो कभी साहिल बनेंगे ये

इन्हीं की ये दबी चीखें जगायेंगी इन्हें इक दिन
हमें उम्मीद है कल मुल्क के हासिल बनेंगे ये
Dr. Urmilesh Shankhdhar