Dr. Urmilesh Shankhdhar

गिरते पेड़ों की ये सूरत नहीं देखी जाती
हमसे इस बाग़ की हालत नहीं देखी जाती

लोग जिस डाल पे बैठे हैं उसे काट रहे
हमसे लोगों की यह ग़फलत नहीं देखी जाती

अपने मन्दिर में भी देती है जो क़ातिल को पनाह
हमसे ईश्वर की वो मूरत नहीं देखी जाती

देख सकते हैं सियासत की डगर में सब कुछ
हमसे मज़हब की तिजारत नहीं देखी जाती

फूल कल ख़ारों से रो-रोके यही कहते थे
अब तो भँवरों की शरारत नहीं देखी जाती

उनके दिल में किसी शैतान का डेरा होगा
जिनसे इन्सां की मुहब्बत नहीं देखी जाती

दोस्तो अब तो ज़रा हाथ में पत्थर ले लो
अब तो ईटों की ये हरकत नहीं देखी जाती
Dr. Urmilesh Shankhdhar