और करता भी क्या तीरगी के लिए
दिल जलाना पड़ा रोशनी के लिए
बेबसी बढ़ रही है जिधर देखिये
काम आये न कुछ ज़िन्दगी के लिए
चाहें इज़्ज़त लुटे या जले घर कोई
इक ख़बर चाहिए सनसनी के लिए
क़ायदे और क़ानून क्या पूछिये
बस रक़म चाहिए मुंसिफ़ी के लिए
फ़र्क़ दैर-ओे-हरम बाद की बात है
सिर्फ़ दिल पाक हो बंदगी के लिए
कितने ग़म हमको आतिश उठाने पड़े
ज़ीस्त की राह में इक ख़ुशी के लिए
Aatish Muradabadi