Aatish Muradabadi

मैं शम्म-ए-इश्क़ जला लूँ अगर इजाज़त हो
तुझे मैं दिल में बसा लूँ अगर इजाज़त हो

तेरी निगाहों ने बे-ख़ुद बना दिया है मुझे
मैं आज होश मैं आ लूँ अगर इजाज़त हो

लबों पे आपके जो बिजलियाँ मचलती हैं
मैं उनमें खुद को जला लूँ अगर इजाज़त हो

तेरा सहारा जो मिल जाए उम्र भर के लिए
मैं आशियाना सजा लूँ अगर इजाज़त हो

बिखर गए हैं ये गेसू बदल गया मौसम
मैं इनका लुत्फ़ उठा लूँ अगर इजाज़त हो

तू हम नवा है मेरी हसरतों की दुनिया का
यक़ीं मैं दिल को दिला लूँ अगर इजाज़त हो

जो तूने ख़्वाब-ए-मुहब्बत अता किया आतिश
उसे मैं दर्मां बना लूँ अगर इजाज़त हो
Aatish Muradabadi