डॉ• सचिन चौधरी 'शाश्वत'

चार पैसे क्या कमाना आ गया
बात बेटों को बनाना आ गया

गाँव से हरियालियाँ रुख़सत हुईं
खेत में जब कारखाना आ गया

तंज़ पे पहले-पहल तो दिल दुखा
रफ़्ता-रफ़्ता मुस्कुराना आ गया

आगे-आगे मैं चला था छोड़कर
पीछे-पीछे ये ज़माना आ गया
डॉ• सचिन चौधरी 'शाश्वत'