Gulshan Mehra

जागती आँखों से तेरे ख़्वाब कब तक देखता
मैं अकेला बैठकर तालाब कब तक देखता

मुझको अपने तौर से जीना था सो मरना पड़ा
जो मेरे थे ही नहीं आदाब, कब तक देखता

हार कर इक ग़ैर का एहसाँ उठाना पड़ गया
आप का मुँह हल्क़ा-ए-अहबाब कब तक देखता

आख़िरश आग़ोश में ले ही लिया मैंने उसे
रात भर अब रूबरू महताब कब तक देखता

एक दिन जाना ही था मुझको दयार-ए-ग़ैर से
मैं ज़माने तेरे आब-ओ-ताब कब तक देखना
Gulshan Mehra

Gulshan Mehra | We The Sukhanwar