वो अब किसी रक़ीब की बाँहों में क़ैद है
पानी की बूंद जैसे घटाओं में क़ैद है
साया जिसे था करना किसी राहगीर को
वो पेड़ बद-नसीब है गमलों में क़ैद है
रोया बहुत पर आँख से आँसू नहीं गिरे
सिसकी भी मेरी कब से ही होटों में क़ैद है
भँवरा भले ही उड़ गया हो रस निचोड़कर
ख़ुशबू अभी भी बाग़ के फूलों में क़ैद है
उस हुस्न को मैं चाहता हूँ रू-ब-रू दिखे
जो हुस्न मेरे रात के ख़्वाबों में क़ैद है
जो क़त्ल कर रहा है उसे कोई डर नहीं
जो बेगुनाह है वो सलाखों में क़ैद है
जिसको दिल-ओ-दिमाग़ से बे-दख़्ल कर दिया
फिर उसका अक्स क्यों मेरी आँखों में क़ैद है
इज़हार चाहकर भी उन्हें कर नहीं सका
इक फूल अब भी मेरे किताबों में क़ैद है
Santosh sagar