दिनकरों की प्रतीक्षा में खड़े, हे चन्द्रमा!
ख़ुद चमकना सीख लो
या तो उजाले भूल जाओ!
रहके जीवित मोक्ष पाना है कठिन, तो तुम मरो
शान्ति का पथ और शीतलता को त्यागो, तप करो
त्यागकर उल्लास सारे, खोज लो विस्तार अपना
इस नियति के पार जा, मन के मनोरथ तुम वरो
वारिधर की प्रतीक्षा में पड़ी, हे उर्वरा!
ख़ुद बरसना सीख लो
या मेघ काले भूल जाओ!
क्यों पसारे हाथ तुमने, शक्तियों की क्यों विनय की?
क्यों नये भगवान रचकर शीश रखकर अनुनय की?
छोड़कर अनुनय-विनय अब, तुम बनो ख़ुद के नियंता
शक्तियों को करो जाग्रत फिर रखो इच्छा विजय की
दूसरों की प्रतीक्षा में पड़े हे कुटिल मन!
अन्नदाता ख़ुद बनो
या तो निवाले भूल जाओ!
शुभम तिवारी