Shravan Kumar

बढ़ते नहीं हैं वो लफ़्ज़ों के मआनी से
कैसे समझेंगे हमको आसानी से

आज वही बचपन तन्हा सो जाता है
सोता था जो लोरी और कहानी से

सच को कितना रुसवा कर डाला तुमने
क्या मिलता है तुमको झूठ बयानी से

गिरने लगे हो तुम अपनी ही नज़रों में
होने लगी हैं आँखें ख़ाली पानी से

मिसरा ए ऊला का कोई जवाब नहीं
रब्त नहीं पर उसका कोई सानी से
Shravan Kumar