हम हृदय की वेदना को बस हृदय धर रह गयें

देवताओं से मनुज तक सब मिले पाषाण के
हम हृदय की वेदना को बस हृदय धर रह गयें।

लाख हमनें भूमि सींची चक्षुओं के नीर से
वाटिका फिर भी हमारी पुष्प से ख़ाली रही
लाख हमनें चाँद-तारे ला बिठायें रात में
सत्य है पर नेह के बिन पूर्णिमा काली रही

कह न पायें पर किसी से हाल अपना हम कभी
हम समय की वेदना को बस हृदय धर रह गयें।

सात फेरे ले अनल के ले गया कोई कमल
भोर का था पुष्प चाहा साँझ दल-दल की मिली
अंजुरी पर अंजुरी हम चाहते थें प्रेम की
अंजुरी को अंजुरी पर चक्षु के जल की मिली

आँख मूँदे सो गये सब स्वप्न तोरण द्वार के
हम प्रणय की वेदना को बस हृदय धर रह गयें।

चल न पायें साथ दोनों रह न पायें साथ में
और कहने को जुड़े थें दो सिरे इक तार से
खिल न पायें साथ में हम झुक न पायें साथ में
पेड़ होकर शाख को हम रख न पायें प्यार से

बाप होने का कभी इक फ़र्ज़ निभ पाया नहीं
हम तनय की वेदना को बस हृदय धर रह गयें।
Janib Vishal