Shivsagar Sahar

दिल समझता है इस कमी का दुःख
मुझको है एक जोगिनी का दुःख

तुमसे इक पल जो दूर होता हूँ
जैसे लगता है इक सदी का दुःख

नाप सकते नहीं हैं गहराई
इक समंदर है इस्त्री का दुःख

दुःख में सबके शरीक होता हूँ
देख जाता नहीं किसी का दुःख

एक बेवा ही तो बताएगी
कैसा होता है बेवगी का दुःख

राज़ दिल का बता नहीं सकता
मैं समझता हूँ ज्योतिषी का दुःख

ढ़ो रहा हूँ मैं एक मुद्दत से
कोई समझे तो नौकरी का दुःख
Shivsagar Sahar