वक़्ते गर्दिश में अगर तेरा सहारा होता
आलमे ज़ीस्त का फिर और नज़ारा होता
साथ देते जो अगर तुम मेरा संघर्षों में
ख़्वाब सच होते बुलंदी पे सितारा होता
छोड़ के आता तेरे पास जहां मैं, लेकिन
दिल से इक बार मुझे तुमने पुकारा होता
धूल जमती न कभी ज़ीस्त के आईने पर
काश चेहरे सा भी रिश्तों को सँवारा होता
लोग मुझको न सरे बज़्म पशेमां करते
ऐसी साज़िश में न गर तेरा इशारा होता
ज़िन्दगी तुम जो अगर साथ निभाते मेरा
पास अपने भी कोई आँख का तारा होता
'राज' ग़ज़लों में अगर थोड़ी रवायत होती
आपके नाम से भी कोई शुमारा होता
Rajesh Jaiswara