Divya singh sisaudia

महकी महकी अमराई हैं,कब आओगे
कोयल छेड़े शहनाई है,कब आओगे

काट रहे हैं घर के सब खिड़की दरवाज़े
सूनी सूनी अंगनाई है,कब आओगे

दिल के ज़ख़्मों को थोड़ा मरहम मिल जाये
पीर बढ़ाती पुरवाई है,कब आओगे

कलियों का मुस्काना, इन फूलों का हंसना
लगता कितना दुखदाई है, कब आओगे

आ जाओ तो सचमुच ये घर,घर हो जाये
मैं हूं मेरी तनहाई हैं, कब आओगे
Divya singh sisaudia