Divya singh sisaudia

रिश्तों को फूलों सा पाला, पलकों पर अपना घर रक्खा
और बात है हमनें अपने दिल में एक समंदर रक्खा

माता रानी, कृष्ण कन्हैया, रामचंद्र जी सबको पूजा
लेकिन अपने पापा का फोटो मंदिर में ऊपर रक्खा

नामुमकिन है मेरे मन की संकरी गलियों तक आ पाना
लेकिन जो भी मुझतक आया उसको खुद के भीतर रक्खा

कितना नाज़ुक था मन मेरा कोई चोट न सह पाता था
लेकिन तुमने दगा दिया तो, मन पर पहला पत्थर रक्खा

कितनी राहें कितनी बाहें मेरा मन भटकाने आयी
पर मैंने सब कुछ ठुकराकर, ज़िंदा अपना तेवर रक्खा
Divya singh sisaudia