Divya singh sisaudia

परिश्रम तो किया परिणाम ही अच्छे नहीं निकले
तलाशी ली गई आँखों की पर सपने नहीं निकले

सब अपने अपने मोबाइल में थे मशग़ूल इस दर्जा
बजा डमरू मदारी का मगर बच्चे नहीं निकले

समझने में किसी को भूल हो जाना भी मुमकिन है
तुम्हें अपना समझती थी तुम्हीं अपने नहीं निकले

अपाहिज एक भिखारी हाथ फैलाता रहा दर दर
गए कुछ हाथ जेबों में मगर सिक्के नहीं निकले

सफलता के लिए तदबीर करनी भी ज़रूरी है
उन्हें कब मिल सकी मंज़िल जो घर ही से नहीं निकले
Divya singh sisaudia