मायने जो भी थे प्रेम के
वे बिछड़कर समझ आ गए
ख़्याल था नेह था एक दूजे का पर
प्रेम है या नहीं हम समझ ना सके
भावनाएं हमारी पहेली रहीं
जो पहेली किसी से सुलझ ना सके
इस पहेली को सुलझाने में
ज़िंदगी को ही उलझा गए
मायने जो भी थे प्रेम के
वे बिछड़कर समझ आ गए
आज तक प्रेम हमको दिखावा लगा
प्रेम को वासना हम समझते रहे
साफ नीयत नहीं देख पाए कभी
सिर्फ़ चेहरे पे जां हम छिड़कते रहे
प्रिय आंखों से ओझल हुए
और उर में सतत छा गए
मायने जो भी थे प्रेम के
वे बिछड़कर समझ आ गए
त्याग से प्रेम बढ़ तो गया था मगर
यातनाओं से ये ज़िंदगी भर गई
प्रेय को दूर जाता हुआ देखकर
श्वास चलती रही आत्मा मर गई
जाते-जाते वो मन को मेरे
मोम की तरह पिघला गए
मायने जो भी थे प्रेम के
वे बिछड़कर समझ आ गए
Sani Singh