सुब्ह-ओ-शाम है विर्द हमारा, ज़िक्र तुम्हारा
दर्द-ए-दिल का एक ही चारा, ज़िक्र तुम्हारा
दीवारों से बात न करते तो क्या करते
तन्हाई में सिर्फ़ सहारा, ज़िक्र तुम्हारा
घोल रहा है कानों में रस कैसे कैसे
शहद से मीठा नमक से खारा, जिक्र तुम्हारा
दिल-सैलानी वादी-ए-हुस्न की सैर पे निकला
लब डल झील हैं और, शिकारा ज़िक्र तुम्हारा
इक पल में ऐसे सुलगा देता है, जैसे
दिल-बारूद हो और, शरारा ज़िक्र तुम्हारा
गाहे-ब-गाहे आ ही जाता है होंठों पर
है कोई बादल आवारा, ज़िक्र तुम्हारा
सुन रहे थे फ़लक पे तारे 'अनीस' अदब से
छेड़ रहा था एक सितारा, ज़िक्र तुम्हारा
Anis shah anis