आने लगे मज़ा जो किसी इंतज़ार में
समझो की रूह क़ैद हुई है दिवार में
क्या बददुआ है इश्क़ को ,पूरा न हो सका
पंछी है ये ख़िज़ाँ का जो मरता बहार में
करना वहीं जो सह सको , ख़ुद पर भी वार तुम
आई ...ये बात उनको समझ चार बार में
जब जंग सी छिड़ी हो कभी दिल दिमाग़ की
लुटती है कायनात ही फिर दिल की हार में
साक़ी ने जाम भर तो दिया प्यास देख , पर
हमसे भी तिश्ना लब कई थे उस क़तार में
अव्वल रहेगी वस्ल की मन्नत में ये कशिश
खामोश हिज्र की भी सदा थी पुकार में
ख़्वाबों को रात भर का बयाना चुका दिया
देखा है उनको चोर नज़र से बज़ार में
Pooja Bansal