ज़िक्र तेरा मेरी साँसों को यूँ महकाता है
मेरा कमरा तेरी ख़ुशबू से महक जाता है
तेरी यादों से इसे बहला लिया करता हूँ
शब-ए-फुरक़त जो कभी दिल मेरा घबराता है
अपने माज़ी के बियाबाँ में मुझे दूर तलक
तेरी यादों का हिरन ख़ूब ही दौड़ाता है
तेरे दीदार की जब प्यास सताती है मुझे
दिल के सहरा में तेरा अक्स नज़र आता है
पर्दा खिड़की का उड़ाती हैं हवाएँ जब 'अनीस'
ऐसा लगता है कि आँचल तेरा लहराता है
Anis shah anis