Manjul Manzar Lucknowi

सियासत ने दैर-ओ-हरम बेच डाले
मोहब्बत ने अपने सनम बेच डाले

अदीबों ने जब सौदेबाज़ी शुरू की
ज़बां बेच डाली कलम बेच डाले

किसी ने खुशी के लिफ़ाफ़े में रखकर
हमें ज़िन्दगी-भर के ग़म बेच डाले

वो इंसाँ ही था जिसने इंसाँ के हाथों
मिठाई के डब्बे में बम बेच डाले

जिन्हें बाँटनी थीं ज़माने में ख़ुशियाँ
उन्होंने ही जुल्म-ओ-सितम बेच डाले

हुई है फ़रेबों से जब आशनाई
यक़ीं बेच डाला भरम बेच डाले

उन्हें दोस्तों से गरज़ ही नहीं कुछ
दुआएं, नवाज़िश, करम बेच डाले
Manjul Manzar Lucknowi