एक पल में तीरगी से रोशनी होते हुए
क्या कहें कैसा लगा था आपकी होते हुए
आपके होठों से लगने के लिए हम व्यग्र थे
दर्द सहना लाज़िमी है बाँसुरी होते हुए
कैसे-कैसे ख़ुशनुमा एहसास से गुज़री हूँ मैं
शाख पर खिलते गुलों की ताज़गी होते हुए
आपकी होने से पहले मैं अधूरी थी बहुत
मुतमइन हूँ अब मुकम्मल ज़िंदगी होते हुए
Divya singh sisaudia