आप क़ाफ़िर वो मुसलमान समझते हैं मुझे
बस जो इंसान हैं इंसान समझते हैं मुझे
सूखे फूलों को पता है कि कहानी क्या है
मेरे कमरे के ये गुलदान समझते हैं मुझे
उसने अहवाल जो पूछा तो कहा अच्छा है
जो समझते हैं, परेशान समझते हैं मुझे
ख़ैर-मक़्दम है मुझे आपने सीढ़ी समझा
जो हैं ऊँचाई पे नुक़सान समझते हैं मुझे
माँगने वाले भी औक़ात कहाँ देखते हैं
ऐसा लगता है कि भगवान समझते हैं मुझे
मैं भी वो हूँ कि कभी उफ़ नहीं करता दुख पर
मेरे ग़मख़्वार भी बेजान समझते हैं मुझे
एक मैं हूँ जो समझ पाया न "दख़लन" को कभी
और इक आप हैं आसान समझते हैं मुझे
Sandeep Shrivastava