Anis shah anis

गुज़रते वक़्त की ज़ंजीर खींच ली जाये
मिले हैं यार तो तस्वीर खींच ली जाये

सहीह आपका अंदाज़-ए-गुफ्तगू तो नहीं
कि बात बात पे शमशीर खींच ली जाये

जो ख़्वाब देख लिये गर हमारी आँखों ने
तो ऐसा कीजिए ताबीर खींच ली जाये

इन्होंने की है बग़ावत नसीब से क्योंकर
अब इनके ज़ेह्न से तदबीर खींच ली जाये

खड़ी है शान से ये अम्न की इमारत गर
तो भाईचारे की शहतीर खींच ली जाये

हुक़ूक़ के लिए आवाज़ जो उठाये तो
ज़बान वो बिना ताख़ीर खींच ली जाये

हमारी भूख पे जो क़हक़हे लगाते हैं
अब उनके सामने से खीर खींच ली जाये

जवाब दे ही चुका ज़ब्त अब 'अनीस' मेरा
कि रूह खींच के ये पीर खींच ली जाये
Anis shah anis